वैसे तो यह शहर बहुत से चीज़ों के लिए विश्व में प्रसिद्ध है। इसमें से ऐसी ही एक चीज़ है: यहाँ की चिकन कारीगरी।
महीन कपड़े पर सुई-धागे से विभिन्न टांकों द्वारा की गई हाथ की कारीगरी लखनऊ की चिकन कला कहलाती है। अपनी विशिष्टता के कारण ही यह कला सैंकड़ों वर्षों से अपनी लोकप्रियता बनाए हुए है।
यदि कोई ब्रश और रंगों के सहारे चित्रकारी करे तो इसमें नई बात क्या हुई! लेकिन अगर ब्रश की जगह एक महीन सुई हो और रंगों का काम कच्चे सूत के धागों से लिया जा रहा हो और कैनवास की जगह हो महीन कपड़ा, तो ऐसी चित्रकारी को अनूठी ही कहा जाएगा।
चिकन का शाब्दिक अर्थ ही होता है: कढाई। यह पारंपरिक कढ़ाई शैली लखनऊ के सबसे प्राचीन और जाने-माने कला रूपों में से एक है।
इसकी शुरुआत को लेकर भी भिन्न भिन्न कहानियाँ प्रचलित हैं। मेगस्थनीज ने, 3 शताब्दी ईसा पूर्व में,भारतीयों द्वारा मुसलिन के उपयोग का उल्लेख किया है।
एक कहानी भी है जो बताती है कि कैसे एक यात्री ने पानी के बदले में लखनऊ के एक किसान को चिकनकारी सिखाई। तो एक अन्य स्पष्टीकरण भारत में चिकनकारी कढ़ाई के काम को शुरू करने का श्रेय सम्राट जहांगीर की रानी नूरजहां को देता है।
चिकन की कला, अब लखनऊ शहर तक ही सीमित नहीं है अपितु लखनऊ तथा आसपास के अंचलों के गांव-गांव तक फैल गई है। इस हस्तशिल्प उद्योग का एक खास पहलू यह भी है कि उसमें 95 फीसदी महिलाएं हैं। अतः यह उनके जीवनयापन का जरिया भी है और उन्हें आर्थिक आज़ादी भी प्रदान करता है।










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